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माँ

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तुम्हे आँधियों में सम्भाला है उसने, अपने भरोसे ही पाला है उसने, लुटा देगी सबकुछ, अदा क्या करोगे, "माँ " है वो साहब दया क्या करोगे। 🙏            -supriya singh

माँ

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तुम्हे आँधियों में सम्भाला है उसने, अपने भरोसे ही पाला है उसने, लुटा देगी सबकुछ, अदा क्या करोगे, "माँ " है वो साहब दया क्या करोगे। 🙏            -supriya singh

ज़िन्दगी

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तू साँझ सी ढलती कभी ,है कभी सुनहरी धूप खिली  हैं  राहतें  तुझमे ,तो कुछ बेचैनियाँ भी हैं।  एक पल को तू है सामने करती कई अटखेलियाँ  दूजे ही पल बन बैठी कई पहेलियों सी है।  है समय की  पाबंद तो अलसाई सी है कभी  मिजाज़ में तेरे भी कुछ मनमानियाँ तो  हैं।  धड़कती  तू  है कहीं मैं बिसर (भूल)जाती हूँ तुझे  ये फ़ुर्सतों की कमी  मेरी मजबूरियाँ जो हैं।  बहकी -बहकी सी है तू कुछ,उलझी -उलझी सी हूँ तुझमे  संग तेरे इस सफ़र में बड़ी गहराइयाँ भी हैं।                  -सुप्रिया सिंह 

सही कौन

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इश्क

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मन मौन

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प्रेम भक्ति

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ऐसी लगी लगा दे मोहे ,रंग तेरे रंग जाऊँ प्रीत ओढ़ कर तेरी , सारा जग बिसरा ही जाऊँ। तू मै, मै तू  होकर जोगी कुछ ऐसे रम जाएंँ दरस तेरे हों देख मुझे कर, एक नज़र हो जाएँ। दरस करे जो दो देहिन  के, एक ही भेद बताए वह थी चरणों शीश नवाए वह, मंद-मंद मुस्काए।  प्रेम भक्ति में डूब तरूँ  जब ,पार तुझी में पाऊँ इक तेरी हो रह जाऊँ ,और ,बस तेरी धुनि लगाऊँ । जीऊँ  तुझमे  मगन रहूँ  तन छोड़ तुझे ही पाऊँ छोड़ जगत के माया बंधन, प्रवाह मुक्त  हो जाऊँ।  रंग तेरा ,यूँ  रहे संग ,के रंगीली कहलाऊँ बस रहे मुझे  सायुज्य तेरा, मैं पावन होती जाऊँ। ©® सुप्रिया सिंह  चित्र :गूगल साभार 

समझ

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खिलखिलाहट न जाने कब मुस्कराहट में बदल गई , मस्ती मज़ाक, न जाने कब अदब में बदल गए।  चँहकते दौड़ लगाना संभल कर चलना हो गया  अपने ख्यालों में खोए रहना बांवरापन सा हो गया।  जो कभी छोटे -छोटे से सपने थे , आज पर्वतों से ऊँचे और कठिन लगने लगे।  जहाँ बिन कहे ही ज़रूरतें पूरी हो जाया करती थीं  वहाँ ज़रा-ज़रा सी ख़्वाहिशों पे रोना मचने लगा।  बेफिक्र अपनी बात कह देना , अब सोच समझ कर बोलना हो गया.  न जाने कब सबके साथ प्यार से रहने की सीख , सोच समझ कर रिश्ते बनाने में बदल गई।  सब बेपरवाह ज़ाहिर कर देना , घुट- घुट कर  जीना हो गया।  बिन बताए मन के काम कर लेना , आज मन मसोस कर रह जाने सा हो गया है।  बस यूँ  ही खुद को गवाँते,भारी कीमत चुकाते, न जाने कब हम समझदार हो गए।                                ©सुप्रिया सिंह                 

हौंसला

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 मिली जो मुझे दुश्वारियों की गली , चल पड़ी जिन पर मै,करके सब कुछ फ़ना।  कहते हैं वो कि खोनाऔर पाना ही तो है ज़िन्दगी,  लगा मिल जाए शायद मुझे कुछ नया।  वक़्त-ए-सितम पर जो मरहम करे , बिखरे ख्वाबों को दे मेरे फिर से सजा।  जो चले संग मेरे दूर तक बस यूँ ही , ना रखे हिसाब गुज़रते वक़्त का।  ढूंढा,देखा उसे हर तरफ,हर जगह, पर ऐसा तो कोई ना  मिला सका।  बैठे -बैठे यूँ ही बस ख़याल आ गया , मिली हैं जो फ़ुरसतें,उठा लूँ कुछ फ़ायदा।    झांँक लूँ ख़ुद के भीतर,जो अब तक ना  किया, जो झाँका तो,टूटा बिखरा-सा मिला सब वहाँ।   इक दफ़ा ,खुद सम्भलने की कोशिश न की , रोज़ अगली ही मै उठ खड़ा हो गई।   छोड़ कर राह तकना, कर दिया अब शुरू  काम खुद को सँवारने और बेहतर करने का, उस दिन यूँ लगा कि हाँ ,था वो यहीं  मेरे भीतर कहीं ,थी रही खोज जिसको यहाँ से वहाँ , था नया-सा वो बस ,कुछ बढ़ा सा वो बस  कुछ और नहीं   हौंसला   था मेरा।  ©®सुप्रिया सिंह  ...

मनमर्ज़ियाँ

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          आखिर एक दिन समझ और अनुभवों में विश्वास दिलाने वाले  संस्कारों को धकेलते हुए ,उसने कह ही दिया।  यह जो मेरे पल हैं ना , अपनी तरह से जीऊँगी इन्हे मै।  और क्या  पता ,लोगों के पुराने अनुभवों से मेरा इत्तेफाक हो ना  हो।  हो सकता है ,खुशियाँ मिलें उस राह पर मुझे  जिस राह पर तुमने  काँटे चुने।  तो कर लेने दो ना मुझे अपनी मनमर्ज़ियाँ , जो तुम्हारी नज़र में आज भी गलतियाँ हैं।  ©®सुप्रिया सिंह                          

वो बचपन

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वो हँसता वो खिलखिलाता सा बचपन,बेबात ही मुस्कुराता वो  बचपन , वो ड़र -ड़र  के सीखने में,गिरता कभी लड़खड़ाता सा बचपन।  रेत के इग्लू बनाता वो बचपन, मोहल्ले में हुल्लड़ लगाता वो बचपन , हरदम ही अपनी चलाता वो बचपन,न मानो तो रूठ जाता वो बचपन।  बरसाती पानी के छींटे उड़ाता , कुछ मटमैला,कुछ भीगा-सा बचपन , माटी में खेले,और खाने को माटी, लोगों से नज़रें बचाता वो बचपन।   तितली पकड़ने कि कोशिश में ,वो उड़ता दौड़ लगाता-सा  बचपन, छुपम-छुपाई ,पकड़म-पकड़ाई मनमाने खेल खिलाता वो बचपन।   त्योहारों की मिठाई देख ललचाता,मिलने कीआस में चक्कर लगता वो बचपन , छत से पानी के रंगीन  गुब्बारे फोड़े,बचने को खुद झट से नीचे बैठ जाता वो बचपन।  छुप-छुप के चीज़ें चुराता कभी,पकड़े जाने पर गुमसुम सा डाँट खाता वो बचपन , आँखों से दो मोती गिरा कुछ ही देर में,सब भूल जाता वो मस्तमौला सा बचपन।  न माने किसी की वो ज़िद्दी सा बचपन ,अपनी ही  चलाए  वो पिद्दी सा बचपन , न रूठने ही दे नादानियों से अपनी ,निश्छल मनोभाव वाला वो बचपन।  व...

तब दर्द बहुत ही होता है

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जब पर हों ,पर परवाज़ ना हो  जब सुर हो ,पर साज़ ना हो , हो हिम्मत पर आगाज़ ना हो  तब दर्द बहुत ही होता है।  जब हुनर खड़ा हो साथ संग  पर बढ़ना आगे लगे जंग , जब पीछे खींचे अपने ही  तब दर्द बहुत  ही होता है।  जब अँधियारे सा हो प्रभात  हो पग -पग गिरना आम बात , हो, समझाना  खुद को मुश्किल  तब दर्द बहुत ही होता है।  जब जीवन हो एक बंदी सा  और  कारागृह में  द्वार न हो, हो सन्नाटा तन्हाई का  तब दर्द बहुत ही होता है।  न मिले उचित सम्मान कभी  इन अरमानों को जान कभी , बेजान पड़े अरमानो को लेआगे बढ़ना होता है   तब दर्द बहुत ही होता है।                                 © सुप्रिया सिंह                                      चित्र : गूगल साभार        ...

वह मस्त बड़ा

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वह  दर्द , दर्द का गश्त बड़ा ,उस नशे में था वह  मस्त पड़ा  ना आगे ना पीछे कोई ,अपनी मस्ती में मस्त रहा।  जब जहाँ जी किया निकल दिया , ना पता उसे है परवाह क्या  जीवन के दिए आघातों ने , कर दिया उसे है सख़्त बड़ा।   अब राहों की दुश्वारियाँ  भी, लगती हैं उसको अपनी सी  कष्टों की इतनी मार सही, ये कष्ट ही उसका ईश हुआ।  वह  दर्द दुखों की कील चुभन , राहों की ठोकर और पतन   वह  जीर्ण -शीर्ण  जीवन उसका , है देने लगा आनंद बड़ा।  अब दुःख को ही सर्वस्व बना , अंतर्मन से सब भाव मिटा  अपने तन मन को वज्र बना , है संघर्षों की भेंट चढ़ा  है  जागृत मन , उन्नत मस्तक जो डिगा नहीं आघातों से , जीवन के झंझावातों से ,पाता है  खुद को प्रबल खड़ा।  वह  दर्द ,दर्द का गश्त बड़ा ,उस नशे में है वह  मस्त खड़ा।                                            ...

शिवाय

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हर हर  महादेव 🙏 अनाथों के नाथ दीनानाथ शम्भू  हे शिवम्   कृपा से तेरी जग में तर गए कई अधम  हर हर हर महादेव डम डम डमरू के स्वर  कर रहे प्रसार जग में जीवन का प्रतिक्षण  सत चित आनंद की त्रिवेणी है त्रिशूल में  उठ गई जीवन मरण से आके चरणों की धूल में  शूल अँधकार के जो जीवन में थे कभी  नाम मात्र से प्रभु के कण -कण बिखर गए  वो सार हैं ब्रह्माण्ड के उस सार के  हम  अंश हैं   विषधर शिवाय नीलकण्ठ रौद्राय शिव, शिव ही विध्वंस हैं  थाम्ह हाथ शिव का साथ अवगत हुई खुद से आज  मोह ये जगत का छोड़ मोक्ष पथ पे चल दी आज  शोक भय दुःख के सार हट  गए मन से परे  शंकर सहाय तो भयंकर भी क्या करे " नमः शिवाय "                                   ©सुप्रिया सिंह                                 ...